Tuesday, November 6, 2012

कुछ यूँ ही


अफ़सोस

बहुत बनाई हमने बात, बात ये बनी नहीं
चाँद खींचा हमने सारी रात, रात ये थमी नहीं


तुम

तुम जो आते हो तो ख़ामोशियाँ गुनगुना उठती हैं,
वरना मुझसे तो मेरी आवाजें भी बोलती नहीं.

तू

मेरी रूह में बस गयी है तू, तुझसे जुदा खुद को मैं पाता नहीं,
तेरे दर पे सजदा करता हूँ, तेरे सिवा अब कहीं जाता नहीं.


मुसाफ़िर

अपनी कश्ती का मैं ही हूँ माझी भी मुसाफ़िर भी,
तन्हाई ही सफ़र है मेरा तन्हाई ही मंज़िल भी.



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अनिरुद्ध
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