Friday, July 12, 2019

यादों की पोटली

यादों और वादों की वही पुरानी पोटली
साफ़-सफ़ाई के दौरान फिर निकल आयी
आँखों के किनारे कहीं जमे हुये कुछ ख़्वाब
फिर तंज़ कसने लगे
उन ख़्वाबों से नज़रें चुरा कर पोटली के अंदर देखा
तो पाया की पूरनमासी का वो चाँद
जो उस पहली रात को
चुपके से हाथों में भर लिया था
रोज़ घुल-घुल के आधा रह गया है
नये रतजगों के वो गीले लाल डोरे
जो कभी तुम्हारी आँखों में रहा करते थे
उनमें सीलन आ गयी है
और साँसों की वो गर्मी
जिससे हमने ना जाने कितने ही रात और दिन पिघलाए थे
वो सर्द आहों में रोज़ ठिठुरती है
ख़ैर-
इन बातों का तुम ज़रा सा भी मलाल न करना
हाल ही के दिनों में इकट्ठा हुई
कुछ नयी यादें और कुछ नये वादे भी
इसी पुरानी पोटली में रख दिये हैं
अबकी यूँ करना
की मेरी इस पुरानी पोटली को भी
वक़्त के उसी मंज़र पर छोड़ आना
जहाँ तुम अपनी यादें और वादें छोड़ आये हो

--
अनिरुद्ध 


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Thursday, February 21, 2019

आधे-अधूरे मिसरे

पुरानी किसी ग़ज़ल के मिसरों की तरह हो गयी है तू
आधी-अधूरी याद
आधी-अधूरी भूली सी

नग़मा कोई पुराना सुन लूँ
या फिर
क़िताब कोई पुरानी उठा लूँ
तो वक़्त ख़ुद को दोहराने लगता है
यादों के सफ़हों पे
धुंधला-धुंधला ही सही
तेरा चेहरा उभरने सा लगता है

पूरी शाम कोशिश करूँ
सारे बिख़रे हुये क़िस्से समेटूँ
तब जा के रात ढले
तेरी मुस्कराहट की शबनम बरसती है
चेहरा फिर भी साफ़ नज़र नहीं आता
मग़र रात की तन्हाई में ज़रा आसरा सा हो जाता है

तेरे वादों को हौले-हौले सुलगा लूँ कभी
सिगरेट की तरह
तो आँखों में लाल डोरे तैरने लगते हैं
साफ़ कुछ दिखाई ना दे भले
पर तेरी साँसों की गरमी
सीने में मेहसूस सी होने लगती है

बहुत जी चाहा
कि, उस शहर के उसी मोड़ से
जहाँ ये मिसरे अधूरे रह गये थे
तुझे आवाज़ दे के बुला लूँ
और इन्हें मुक़म्मल कर दूँ
मग़र अब आशिक़ी सी हो गयी है
इन आधे-अधूरे मिसरों से

--
अनिरुद्ध

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Tuesday, March 6, 2018

मुख़्तसर आरज़ू

मुख़्तसर सी आरज़ू थी मेरी
किसी दिन मेरा नाम लेकर
तुम वही इक अहद करती
एक रूमानी सी ग़ज़ल कोई
कानों में गुनगुना उठती
साँसों की थकन
आँसुंओं में रुल पड़ती
तन्हाईयाँ मेरी सारी की सारी
तुम्हारी आवाज़ में ग़ुम जाती
ज़िन्दगी तुम्हारी आँखों के नूर में
फिर झिलमिला उठती
वक़्त के इस ताने-बाने में
तुम्हारे मेरे अफ़साने का
रेशा एक छोटा सा जुड़ जाता
और ज़िन्दगी इस एक लम्हे में
पूरे माने पा लेती

मुख़्तसर सी ये आरज़ू मेरी
ग़र किसी दिन तुमने मुक़्क़मल कर दी होती...

--
अनिरुद्ध







Sunday, November 12, 2017

शाम का वादा

अब तलक इंतज़ार है मुझे
एक शाम का वादा था मुझसे
पहले की तरह गुज़ारोगे
कहा था तुमने
हाँ मसरूफ़ियत बहुत हो गयी है इन दिनों
उम्र का वो दौर हो आया है कि
कहने सुनने को बाकी नहीं कुछ भी
फ़िर भी इंतज़ार है मुझे

यूँही मेज़ पर पैर रख के बैठे रहना
चाय की चुस्कियां लेते हुए
मीर या ग़ालिब की ग़ज़ल कोई
एक दफ़ा फ़िर पढ़ लेना
तुम्हारी रुमानियत भरी आवाज़ सुने मुद्दत हुई
फ़िर भी इंतज़ार है मुझे

बोलना भले ही कुछ भी नहीं
और दफ़्तर का काम ज़्यादा हो तो
लैपटॉप अपना खोल के ऐनक आँखों पे चढ़ा लेना
तुम्हारी आँखों के लाल डोरे
ऐनक के शीशों में शायद ना दिखें
फ़िर भी इंतज़ार है मुझे

एक शाम का वादा था मुझसे
अब तलक इंतज़ार है मुझे

--
अनिरुद्ध







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Thursday, July 16, 2015

मैं तुम्हें फ़िर मिलूँगी

मल्लिका-ऐ-नज़्म ने,
जाते जाते यूँ कह दिया,
मैं तुम्हें फ़िर मिलूँगी,
इक शायर ये सुन कर,
दरवेश बना फ़िरता है,
फ़लक़ दर फ़लक़ भटकता है,
क़ायनात के हर ज़र्रे में,
बस उसे ही ढूँढता है,
अक़्सर मेरे पास आता है,
अगले सफ़र का रसद लेने,
एक-दो घड़ी ग़र ज़्यादा बिठा लूँ उसे,
तो हड़बड़ा कर,
बिना कुछ कहे सुने भागता है,
नादाँ है - समझता ही नहीं,
पलट कर कभी,
वक़्त की राह पर बने,
क़दमों के निशां देखता ही नहीं,
कि अगर देखे तो जाने,
मल्लिका-ऐ-नज़्म,
उसकी क़लम से टपकते,
इक-इक लफ़्ज़ को चुनती है,
गीत, ग़ज़लें, नज़्में बुनती उसके ही पीछे चलती है,
ज़िन्दग़ी का ये मज़्मुआ,
जिस दिन मुक़्क़मल होगा,
उस दिन सबसे ऊँचे फ़लक़ पर,
वो उसे फिर मिलेगी.

--

अनिरुद्ध

(Inspired by "Main Phir Tumhe Milungi" by Amrita Pritam)


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