Friday, November 16, 2012

पेंडेंट


आग के छल्ले हो जैसे,
सुफेद बादलों में लिपटे से,
उमड़-घुमड़ के,
आसमां का हार से बनते,
सूरज की सुनहरी धुप के तागों में बंधे,
जब तुम्हारी सुराह गर्दन पे सजे,
तो दिल से यूँ आह निकली,
खूबसूरत निकला ये हीरों का पेंडेंट,
तुम्हे पहनकर स्वीटो.
--
अनिरुद्ध
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ज़िन्दगी एक दिन की


कुछ ख़ूबसूरत बातों के नक्श,
जब कागज़ पे उतरे,
तब तुम्हारे नाम की इक ग़ज़ल बनी,
मीठी हंसी के काफ़ियों ने,
हर शेर मुक़म्मल किया,
और-तुम्हारी नज़रों के लम्स ने,
अशआरों को नये माने दिये,
दिन-
जो तुम्हारे तस्सवुर से रौशन हुआ,
रात चढ़ते चढ़ते तुम्हारी तारीफ़ के क़सीदे पढने लगा,
इन ग़ज़लों और क़सीदों में स्वीटो,
मुझे तुम्हारे वजूद में पनाह मिली,
किस्मतों के चराग़ जले,
और-तुम्हारे नूर ने मुझे,
एक दिन में इक ज़िन्दगी अता की.
--
अनिरुद्ध
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चूड़ियाँ


घुमक्कड़ वो अब्र आसमाँ में,
सतरंगी धनुक की चादर ओढ़े,
अपनी ही धुन में मगन कहीं जा रहा था,
मैंने आवाज़ देकर रोका उसे,
और पूछा,
ये सतरंगी धनुक ओढ़े कहाँ फिरते हो,
उसने कहा मैं अब्र हूँ,
मेरा अपना कोई रंग नहीं,
मैंने गौर से देखा तो पाया,
ये रंग तो मेरी निगाहों से है,
मैं कुछ इसी उलझन में था,
की तुम्हारी चूड़ियों की खनक ने मुझे चौंका दिया,
अब्र ने हँस के अपनी राह पकड़ी,
और तब मैंने जाना,
तुम्हारी कलाईयों पे सजी सतरंगी चूड़ियों से स्वीटो,
मेरा सारा वजूद रंग हुआ है.
--

अनिरुद्ध
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जब हंसी आँखों में ग़ुम हुई


लोग तब आंसुओं को पी रहे थे,
जब हंसी,
आँखों में ग़ुम हो रही थी,
रोते, सिसकते, दौड़ते, हांफते लोग,
दम तोड़ती मासूमियत को बचाने की,
ईमानदार कोशिश कर रहे थे,
मैं भी तो वहीँ था,
ख़्वाब देखता हुआ,
जब हंसी वाकई आँखों में ग़ुम हो रही थी,
मैंने हाथ बढाया भी,
मगर मेरे हाथों की कपकपाहट देख कर,
हंसी की आँखों में आंसू आ गए,
और अपने ही रोने पे हैराँ हंसी,
आँखों में ग़ुम हो गयी,
हाँ-
उन आंसुओं का खारापन,
अब तलक चेहरे पे चिपका हुआ है,
मेरे अंदर की आग ने,
मेरी आँखों में जमी बर्फ़ को पिघलाया भी,
लेकिन हंसी के आसुओं का नमक,
मेरे चेहरे से नहीं उतरा,
जानता हूँ,
की हसीं का मातम ज़्यादा दिनों तक नहीं चलेगा,
कल फिर कुछ नया ग़ुम होगा,
कल फिर कुछ जुदा मरेगा,
और मैं,
उसके लिए अपने आँखों की बर्फ़ पिघलाऊंगा,
नए की ख़ातिर,
पुराने को भूल जाऊंगा,
हमेशा की तरह,
हमेशा के लिए.
--
अनिरुद्ध
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आख़िरी सांस


चाँद के पार,
सुरमई से आसमानों पे,
तुम्हारी पलकों तले,
शोख़ मुस्कुराहटों के सितारे,
झिलमिलाते से,
एक दूसरे में ग़ुम,
सुबह के कत्थई उजालों से अनजान,
अपने वजूद को जीते हैं,
धडकनों का संगीत रचते हैं,
मद्धम होती साँसों,
और बेखुद होती नज़रों के दरमियाँ,
खुद से परे,
एक दूसरे में सिमटे से,
मिलने और बिछड़ने के अहद में बंधते हैं,
तमन्ना ये की,
वक़्त थम जाये इस मंज़र पर,
और दिल की दुआओं को आराम मिले,
तेरी नज़र के उजालों में खोते हुए,
आख़िरी सांस लें.
--
अनिरुद्ध
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