Monday, September 9, 2013

डायरी

याद है तुमको,
अपने पहले जेबख़र्च के पैसों से,
इक डायरी तुमने, 
तोहफे में दी थी मुझको,
आड़े तिरछे बे-ढंगे से लफ़्ज़ों के,
अधपके से ताने-बाने,
और बनावटी एहसासों के,
कच्चे-कच्चे कुछ अफ़साने,
मैंने उसमें,
अपने तब के हालातों के नाम लिखे थे,
और जब तुमसे आखरी बार रुखसत ली,
तब उसको सीने से लगा कर,
अपनी आँखों का ख़ालीपन, 
शब की तन्हाई में भीगा कर,
ज़र्रा-ज़र्रा उसमें दर्ज़ किया था,
मेरे इश्क़ में लिपटी,
और तेरे लम्स से महकी,
वो डायरी,
अब भी मेरे हालातों का हिस्सा है,
उस डायरी के सफ़हों पे अब, 
राशन का हिसाब होता है.


--

अनिरुद्ध
Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License.

Sunday, August 18, 2013

फिर इक़ कहानी

वक़्त कहता है फिर इक़ कहानी मुझसे,
उसकी हंसी मुस्कराहट तोतली ज़ुबानी मुझसे

हम जागें तो वो सोये, हम सोयें तो वो रोये,
मिलती है उसकी शरारत-ओ-शैतानी मुझसे

ये आँखें तेरी सी वो नाक मेरी सी,
मिलने आई है अम्मा की दुआ पुरानी मुझसे

मन्नतों के रास्तों से जन्नतों के दर तक,
ख़ुश हैं ख़ुदा क़ायनात और जिंदगानी मुझसे

--
अनिरुद्ध

Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License.

Sunday, June 16, 2013

दिल ढूंढता है फिर वो ही फुर्सत के रात-दिन

वो पुरानी गली में घर मेरा,
वो नये मुहल्ले में मकां तेरा,
और वो मेरी लाल रंग की साइकिल,
जिस पर कैंची काट कर,
बेवजह तेरे स्कूल के चक्कर लगते थे,
दोस्तों से ज़्यादा फ़िक़र,
तब गेट पे खड़े चौकीदार की होती थी,
कूलर की ठंडी हवा छोड़,
अमरुद के पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर बैठ,
तेरे कमरे की बंद खिड़की को भी,
पूरी दोपहर ताका करते थे,
और पहली बारिश के साथ खुलते स्कूल के पहले दिन,
बस तेरी ही एक झलक ढूंढा करते थे,
वो भी क्या दिन थे,
आँखों में मासूमियत और दिल में तेरे अरमान होते थे,
और होती थी दोनों हाथों में बस फुर्सतें,

हाँ ग़ालिब साब,
दिल ढूंढता है फिर वो ही फुर्सत के रात-दिन...
--
अनिरुद्ध
Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License.

Tuesday, March 5, 2013

इन्तज़ा


सुबह की मासूम आँखों से देखे थे,
ख़्वाब कई कच्चे से,
हड़बड़ी में यूँ ही मोड़ के,
तकिये के नीचे रख दिए थे सारे,
अब शाम तक कई सलवटें आ गयी हैं उनमें,
तुम आज जल्दी घर आ जाओ,
और अपनी सांसों की गर्मी उधार दे दो,
की रात भर इस्त्री कर,
इन ख़्वाबो की सारी सलवटें दूर करनी हैं

--
अनिरुद्ध
Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License.

Sunday, March 3, 2013

मसाला चाय


पूरी रात तकिये पे,
तुम्हारी महक़ अनमनी सी लेटी रही,
मगर बेख़बर नाक़,
कानों पर खर्राटे चढ़ा,
चादर ताने सोती रही,
तुम्हारी चढ़ी हुई त्योरियाँ देख कर पाजी सूरज,
आज सुबह से ही मुझे चिढ़ा रहा है,
ये सर्दी का भी हिसाब कच्चा है,
जब देखो तब बेमौसम आ कर मेरे सर पे सवार हो जाती है,
तेरी मसाला चाय का ही अब आसरा है स्वीटो,
ताकी सर्दी जाये,
नाक़ ख़बरदार रहे,
और रात भर मुझे तेरी महक़ दोनों हाथों में थामे रहे
--
अनिरुद्ध

Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License.