Sunday, August 18, 2013

फिर इक़ कहानी

वक़्त कहता है फिर इक़ कहानी मुझसे,
उसकी हंसी मुस्कराहट तोतली ज़ुबानी मुझसे

हम जागें तो वो सोये, हम सोयें तो वो रोये,
मिलती है उसकी शरारत-ओ-शैतानी मुझसे

ये आँखें तेरी सी वो नाक मेरी सी,
मिलने आई है अम्मा की दुआ पुरानी मुझसे

मन्नतों के रास्तों से जन्नतों के दर तक,
ख़ुश हैं ख़ुदा क़ायनात और जिंदगानी मुझसे

--
अनिरुद्ध

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Sunday, June 16, 2013

दिल ढूंढता है फिर वो ही फुर्सत के रात-दिन

वो पुरानी गली में घर मेरा,
वो नये मुहल्ले में मकां तेरा,
और वो मेरी लाल रंग की साइकिल,
जिस पर कैंची काट कर,
बेवजह तेरे स्कूल के चक्कर लगते थे,
दोस्तों से ज़्यादा फ़िक़र,
तब गेट पे खड़े चौकीदार की होती थी,
कूलर की ठंडी हवा छोड़,
अमरुद के पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर बैठ,
तेरे कमरे की बंद खिड़की को भी,
पूरी दोपहर ताका करते थे,
और पहली बारिश के साथ खुलते स्कूल के पहले दिन,
बस तेरी ही एक झलक ढूंढा करते थे,
वो भी क्या दिन थे,
आँखों में मासूमियत और दिल में तेरे अरमान होते थे,
और होती थी दोनों हाथों में बस फुर्सतें,

हाँ ग़ालिब साब,
दिल ढूंढता है फिर वो ही फुर्सत के रात-दिन...
--
अनिरुद्ध
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Tuesday, March 5, 2013

इन्तज़ा


सुबह की मासूम आँखों से देखे थे,
ख़्वाब कई कच्चे से,
हड़बड़ी में यूँ ही मोड़ के,
तकिये के नीचे रख दिए थे सारे,
अब शाम तक कई सलवटें आ गयी हैं उनमें,
तुम आज जल्दी घर आ जाओ,
और अपनी सांसों की गर्मी उधार दे दो,
की रात भर इस्त्री कर,
इन ख़्वाबो की सारी सलवटें दूर करनी हैं

--
अनिरुद्ध
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Sunday, March 3, 2013

मसाला चाय


पूरी रात तकिये पे,
तुम्हारी महक़ अनमनी सी लेटी रही,
मगर बेख़बर नाक़,
कानों पर खर्राटे चढ़ा,
चादर ताने सोती रही,
तुम्हारी चढ़ी हुई त्योरियाँ देख कर पाजी सूरज,
आज सुबह से ही मुझे चिढ़ा रहा है,
ये सर्दी का भी हिसाब कच्चा है,
जब देखो तब बेमौसम आ कर मेरे सर पे सवार हो जाती है,
तेरी मसाला चाय का ही अब आसरा है स्वीटो,
ताकी सर्दी जाये,
नाक़ ख़बरदार रहे,
और रात भर मुझे तेरी महक़ दोनों हाथों में थामे रहे
--
अनिरुद्ध

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Thursday, February 21, 2013

ग़ज़ल मुक़म्मल कर दी है


अरसा हुआ मैंने कुछ लिखा नहीं,
कई दिनों से तुमने भी कुछ कहा नहीं,
सर्दी की धूप की तरह,
फुर्सत के लम्हे कम लगते हैं,
इसलिए सोचा की क्यूँ ना आज तुम्हारे नाम की ग़ज़ल लिख दूँ,
या फिर तुम्हारी निगाहों पर रुबाईयां,
या अशआर कोई जो हंसी तुम्हारी फिर गुनगुना ले,
लफ़्ज़ों की मारामारी है,
पुराने सब दोहरा चुका हूँ,
कई-कई मर्तबा,
और नये लफ़्ज़ों की मेहनत से भी बचना चाहता हूँ,
लिखने की क़वायद में क़लम हाथ में लिए बैठा हूँ,
डायरी का खाली वो सफ़हा खुल के हँसता है मुझ पर,
खिड़की से आँगन में झांक के देखा,
तुम शाम के डूबते सूरज की पूजा करती दिखती हो,
घर को, मुझको बांध के ख़ुद से,
तुम रोज़ एक नयी इबारत लिखती हो,
ज़िन्दगी के वीराने को,
आशियाँ का नाम देती हो,
एहसासों का हुजूम,
आँखों को तर कर जाता है,
लफ्ज़ कोई या मिसाल ही कोई,
कैसे बांधे जज़बातों के इस दरिया को,
खाली उस सफ़हे पे नाम तुम्हारा लिख कर,
ग़ज़ल मुक़म्मल कर दी है

--
अनिरुद्ध

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