Sunday, June 16, 2013

दिल ढूंढता है फिर वो ही फुर्सत के रात-दिन

वो पुरानी गली में घर मेरा,
वो नये मुहल्ले में मकां तेरा,
और वो मेरी लाल रंग की साइकिल,
जिस पर कैंची काट कर,
बेवजह तेरे स्कूल के चक्कर लगते थे,
दोस्तों से ज़्यादा फ़िक़र,
तब गेट पे खड़े चौकीदार की होती थी,
कूलर की ठंडी हवा छोड़,
अमरुद के पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर बैठ,
तेरे कमरे की बंद खिड़की को भी,
पूरी दोपहर ताका करते थे,
और पहली बारिश के साथ खुलते स्कूल के पहले दिन,
बस तेरी ही एक झलक ढूंढा करते थे,
वो भी क्या दिन थे,
आँखों में मासूमियत और दिल में तेरे अरमान होते थे,
और होती थी दोनों हाथों में बस फुर्सतें,

हाँ ग़ालिब साब,
दिल ढूंढता है फिर वो ही फुर्सत के रात-दिन...
--
अनिरुद्ध
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Tuesday, March 5, 2013

इन्तज़ा


सुबह की मासूम आँखों से देखे थे,
ख़्वाब कई कच्चे से,
हड़बड़ी में यूँ ही मोड़ के,
तकिये के नीचे रख दिए थे सारे,
अब शाम तक कई सलवटें आ गयी हैं उनमें,
तुम आज जल्दी घर आ जाओ,
और अपनी सांसों की गर्मी उधार दे दो,
की रात भर इस्त्री कर,
इन ख़्वाबो की सारी सलवटें दूर करनी हैं

--
अनिरुद्ध
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Sunday, March 3, 2013

मसाला चाय


पूरी रात तकिये पे,
तुम्हारी महक़ अनमनी सी लेटी रही,
मगर बेख़बर नाक़,
कानों पर खर्राटे चढ़ा,
चादर ताने सोती रही,
तुम्हारी चढ़ी हुई त्योरियाँ देख कर पाजी सूरज,
आज सुबह से ही मुझे चिढ़ा रहा है,
ये सर्दी का भी हिसाब कच्चा है,
जब देखो तब बेमौसम आ कर मेरे सर पे सवार हो जाती है,
तेरी मसाला चाय का ही अब आसरा है स्वीटो,
ताकी सर्दी जाये,
नाक़ ख़बरदार रहे,
और रात भर मुझे तेरी महक़ दोनों हाथों में थामे रहे
--
अनिरुद्ध

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Thursday, February 21, 2013

ग़ज़ल मुक़म्मल कर दी है


अरसा हुआ मैंने कुछ लिखा नहीं,
कई दिनों से तुमने भी कुछ कहा नहीं,
सर्दी की धूप की तरह,
फुर्सत के लम्हे कम लगते हैं,
इसलिए सोचा की क्यूँ ना आज तुम्हारे नाम की ग़ज़ल लिख दूँ,
या फिर तुम्हारी निगाहों पर रुबाईयां,
या अशआर कोई जो हंसी तुम्हारी फिर गुनगुना ले,
लफ़्ज़ों की मारामारी है,
पुराने सब दोहरा चुका हूँ,
कई-कई मर्तबा,
और नये लफ़्ज़ों की मेहनत से भी बचना चाहता हूँ,
लिखने की क़वायद में क़लम हाथ में लिए बैठा हूँ,
डायरी का खाली वो सफ़हा खुल के हँसता है मुझ पर,
खिड़की से आँगन में झांक के देखा,
तुम शाम के डूबते सूरज की पूजा करती दिखती हो,
घर को, मुझको बांध के ख़ुद से,
तुम रोज़ एक नयी इबारत लिखती हो,
ज़िन्दगी के वीराने को,
आशियाँ का नाम देती हो,
एहसासों का हुजूम,
आँखों को तर कर जाता है,
लफ्ज़ कोई या मिसाल ही कोई,
कैसे बांधे जज़बातों के इस दरिया को,
खाली उस सफ़हे पे नाम तुम्हारा लिख कर,
ग़ज़ल मुक़म्मल कर दी है

--
अनिरुद्ध

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Sunday, January 27, 2013

इस्मत की कहानियाँ

इस्मत की कहानियों में सच्चाई पूरी की पूरी होती है। आप पसंद करे या नहीं इससे कोई सरोकार इस्मत को कभी रहा ही नहीं, और यही वजह रही है की उनकी कहानियों के उनके आलोचक भी मुरीद रहे हैं। अपने ज़माने से आगे की कहानियां, जिन्हें हम आज 'प्रोग्रेसिव' कहानियां कहते हैं, 1940-1950 के दशक में भी इस्मत की ख़ासियत थी। उनकी ऐसी ही बेबाक़ कहानियों का एक संग्रह 'सॉरी मम्मी' के नाम से प्रकाशित हुआ है। 
शीर्षक कहानी 'सॉरी मम्मी' कहानी है एक ऐसी एंग्लो-इंडियन महिला मिस्सेस मिच्चेल उर्फ़ मम्मी की जो की शरीफों की बस्ती में शराफ़त से लड़कियों का धंधा किया करती थी। पति के समय पूर्व देहांत से उपजी परिस्थितियों से लड़कर, हारकर, समझौता कर, पूरी नेक नियत से मम्मी यह काम करती थी। अपनी ही बनाई दुनियाँ में मशगूल मम्मी, खुद को चिर-यौवना समझती थी, और इसीलिए जब एक रात एक सुनसान गली में एक शराबी ने उनके साथ बदसलूकी करने की कोशिश की तो उनको सदमा लगा। इस बात का नहीं की उनकी इज्ज़त पर बात बन आई थी मगर इस बात का की शराबी से छीना -झपटी के दौरान जब उनकी नकली बत्तीसी गिर गयी तो वो शराबी सॉरी मम्मी बोल के भाग गया। बनावट ही सही मग़र मम्मी की दुनियाँ का सच भी वही था और इस्मत ने वो ज्यों का त्यों बयां किया। 
'कल्लू की माँ' नामक कहानी में इस्मत ने बड़ी खूबी से उस दौर के समाज का विरोधाभास पेश किया है। समाज की ठुकराई एक बेसहारा औरत अपने बच्चे का पेट भरने को बड़े लोगों के घरों की जूठन धोती और ख़ुद जूठी होने से बचती। पति के गुज़र जाने के बाद से लोगों ने बुरी नियत और गालियों के सिवा उसको और उसके बच्चे को कुछ न दिया। फ़िर एक दिन जब बड़े मियाँ ने अपनी तीमारदारी से खुश हो के निकाह का प्रस्ताव रखा तो ज़मीनी सच्चाई ने उसे मजबूर कर दिया की अपने दादा की उम्र के मर्द से निकाह पढ़ ले। 
महिला सम्लैंगिकता का पहला-पहल इशारा इस्मत की कहानी 'लिहाफ़' में मिलता है। ये कहानी इतनी चर्चित हुई की कुछ झूठी शान ओढ़े समाज के ठेकेदारों ने इस्मत पर अश्लीलता का मुक़दमा भी दायर कर दिया। क़ानून ने फ़ैसला इस्मत के हक़ में दिया और ज़माना इस्मत का क़ायल हो गया। उस दौर मे इस तरह के मुद्दे पर कहानी कहने का साहस इस्मत जैसी बाग़ी शाख्सियत के ही बस की बात हो सकती थी।
इस्मत ने अपनी कहानियों में ज़माने को औरतों के नज़रिए से पेश किया। रिश्ते-नाते और उनके बीच की बनावट या खालीपन कुछ भी इस्मत की निगाहों से न बच सका, फिर चाहे 'नींद' की शहनो हो या 'बहू -बेटियाँ' की मरियम और हुरमा या फिर 'नन्ही की नानी' की नानी माँ हो। सबका हाले-दिल बड़ी ही बेबाकी से पेश किया है।

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