Sunday, November 12, 2017

शाम का वादा

अब तलक इंतज़ार है मुझे
एक शाम का वादा था मुझसे
पहले की तरह गुज़ारोगे
कहा था तुमने
हाँ मसरूफ़ियत बहुत हो गयी है इन दिनों
उम्र का वो दौर हो आया है कि
कहने सुनने को बाकी नहीं कुछ भी
फ़िर भी इंतज़ार है मुझे

यूँही मेज़ पर पैर रख के बैठे रहना
चाय की चुस्कियां लेते हुए
मीर या ग़ालिब की ग़ज़ल कोई
एक दफ़ा फ़िर पढ़ लेना
तुम्हारी रुमानियत भरी आवाज़ सुने मुद्दत हुई
फ़िर भी इंतज़ार है मुझे

बोलना भले ही कुछ भी नहीं
और दफ़्तर का काम ज़्यादा हो तो
लैपटॉप अपना खोल के ऐनक आँखों पे चढ़ा लेना
तुम्हारी आँखों के लाल डोरे
ऐनक के शीशों में शायद ना दिखें
फ़िर भी इंतज़ार है मुझे

एक शाम का वादा था मुझसे
अब तलक इंतज़ार है मुझे

--
अनिरुद्ध







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This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License.

Thursday, July 16, 2015

मैं तुम्हें फ़िर मिलूँगी

मल्लिका-ऐ-नज़्म ने,
जाते जाते यूँ कह दिया,
मैं तुम्हें फ़िर मिलूँगी,
इक शायर ये सुन कर,
दरवेश बना फ़िरता है,
फ़लक़ दर फ़लक़ भटकता है,
क़ायनात के हर ज़र्रे में,
बस उसे ही ढूँढता है,
अक़्सर मेरे पास आता है,
अगले सफ़र का रसद लेने,
एक-दो घड़ी ग़र ज़्यादा बिठा लूँ उसे,
तो हड़बड़ा कर,
बिना कुछ कहे सुने भागता है,
नादाँ है - समझता ही नहीं,
पलट कर कभी,
वक़्त की राह पर बने,
क़दमों के निशां देखता ही नहीं,
कि अगर देखे तो जाने,
मल्लिका-ऐ-नज़्म,
उसकी क़लम से टपकते,
इक-इक लफ़्ज़ को चुनती है,
गीत, ग़ज़लें, नज़्में बुनती उसके ही पीछे चलती है,
ज़िन्दग़ी का ये मज़्मुआ,
जिस दिन मुक़्क़मल होगा,
उस दिन सबसे ऊँचे फ़लक़ पर,
वो उसे फिर मिलेगी.

--

अनिरुद्ध

(Inspired by "Main Phir Tumhe Milungi" by Amrita Pritam)


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Wednesday, June 17, 2015

हाइकु # 02

नज़रें देखें
इश्क़ वस्ल हिज़्र
दुनियां यही.

--
अनिरुद्ध


Monday, June 15, 2015

हाइकु # 01

साँसों में बाँधी
दिल की हसरतें
आँखों से बही

--
अनिरुद्ध